जैसे
तैसे हम ऋषिकेश तो पहुँच गए थे लेकिन हमारा ऋषिकेश भ्रमण का कार्यक्रम चौपट
हो गया था. शाम के ५.३० बज चुके थे. चारो और घनघोर बादल थे जो बस बरसे ही
जा रहे थे. मामा जी कि तबियत पहले से बेहतर थी. मामा जी ने ऋषिकेश में घर
अच्छी जगह पर लिया था शांत और एकांत जगह पर. वह इलाका था तो मैदानी लेकिन
चारो और छोटी छोटी पहाड़िया थी. वैसे तो हमारा उसी दिन वापसी का प्रोग्राम
था लेकिन हालात ऐसे हो गए थे कि हमें रात
को वही रुकना पड़ा. रात को ही घर से फ़ोन आया कि पौरी गढ़वाल के पास कही बादल
फटा है और ऋषिकेश व् हरिद्वार में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है. पिछले
साल केदार नाथ में हुई त्रासदी कि खबरे जेहन में ताज़ा हो गयी. दिन भर के
थके हुए थे इसलिए खाना खाते ही गहरी नींद आ गयी थी. सुबह उठे तो देखा मामा
जी व् पापा जी बाहर फर्श पर बैठकर योग कर रहे थे. आसमान साफ़ था. सूरज निकल
गया था लेकिन सडको पर अभी भी पानी भरा हुआ था.
नाश्ता कर के सुबह ही हम मामा जी का आशीर्वाद लेकर चल दिए. तय कार्यक्रम के अनुसार हमें मेरठ आना था लेकिन साफ़ मौसम और खुला आसमान देख कर मेरा मन ऋषिकेश पर्यटन के लिए ललचाने लगा. हालाकिं पापा जी और मामा जी ने अपनी मजबूरियां बता कर "access denied" का प्रोटोकॉल जारी कर दिया. मजबूरी में मैंने स्टारिंग को मेरठ कि और घुमा दिया. पापा जी के और ऋषिकेश वाले मामा जी के हमेशा से ही वैचारिक मतभेद रहे है. जब भी साथ होते है तो किसी न किसी विषय पर बहस करते रहते है. अब कार में बैठे हुए पापा जी पिछली रात हुई बहस को लेकर पटवारी मामा जी से समर्थन पाने कि उम्मीद में ऋषिकेश वाले मामा जी कि आलोचना कर रहे थे. एक तो पिछला पूरा दिन ट्राफिक जाम में निकल गया था दूसरा घुमने का कोई मौका नहीं मिला था इस कारन मुझे उनकी बाते बर्दास्त से बाहर होने लगी. हम हरिद्वार पहुँच चुके थे. तो गुस्से में मैंने हर कि पैडी के पास कार को पार्किंग कि और घुमा दिया. मामा जी और पापा जी भौचक रह गए. जब तक वे स्तिथि समझ पाते हमारे पीछे गाडियों कि लाइन लग चुकी थी. मैंने कहा कि कम से कम हर कि पैडी पर ही थोड़ी देर घूम लेते है. मजबूरी में दोनों को हामी भरन्नी पड़ी. विनय कि ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था.
यूँ तो हरिद्वार से कई बार गुजर चूका हूँ लेकिन हर कि पैडी पर आने का मेरा पहला अनुभव था. चारो और आस्था का सैलाब था. ऊपर से एक दिन पहले हुई जोरदार बारिश के कारण गंगा भी पूरे उफान पर थी. मामा जी पहले कई बार वहां आ चुके थे. उन्होंने बताया कि यहीं से गंग नहर निकली हुई है यह वाही नहर थी जिसकी पटरी के किनारे किनारे हम मंगलौर से रूडकी तक आये थे. मैं और विनय उत्साहित होकर वही फोटो ग्राफी में मस्त हो गए. पहाड़ी क्षेत्रो में भारी बारिश के कारण गंगा का पानी गंधला हो गया था हर कि पैडी पर चारो और रेत ही रेत फैला हुआ था. कुछ लोग रेत कि सफाई करने में लगे हुए थे. दूर दूर से आस्थावान लोग वहां आते है. मेरे पास शुरू से ही आस्था का आभाव रहा है हर कि पैडी पर आना मेरे लिए केवल पर्यटन और मनोरंजन का जरिया थे. बेहतर पोज कि चाह में विनय चप्पलो के साथ ही रेतीले पानी में उतर गया. वही पास में नहा रहा एक राजस्थानी लड़का जिसकी उम्र मात्र १८ या १९ रही होगी विनय से झगड़ने लगा. झगडा ज्यादा बढ़ता देख फोटोग्राफी बंद कर मैं विनय के पास पंहुचा दोनो लगभग हम उम्र थे. रजिस्थानी लड़के को शिकायत थी कि विनय ने चप्पलो के साथ पानी में उतर कर गंगा के पानी को अपवित्र कर दिया . इत्तेफाक से वही पास में खड़ी एक गाय मल-मूत्र त्याग कर रही थी जो बहकर गंग नहर में समायोजित हो रहा था. उस द्रश्य पर रजिस्थानी लड़के कि राय जाननी चाही. अब अचंभित होने कि बारी मेरी थी उस रजिस्थानी लड़के के अनुसार गाय हमारी माता होती है और उसके मल मूत्र के पानी में घुलने से पानी दूषित नहीं पवित्र हो जाता है. खैर इसके बाद वह राजस्थानी लड़का ज्यादा देर नहीं रुका और गंग नहर में कूदकर तैरता हुआ आगे को निकल गया. आस्था और अंधविश्वास दो अलग अलग पक्ष है. पुल कि और आगे बढे तो अनायास ही सीढियों पर लाइन लगाकर बैठे भिखारियों पर नजर गयी. एक महिला भिखारी एक श्रद्धालु से झगड़ रही थी. उसकी साथी महिला भिखारी को भीख दी तो उसे क्यों नहीं दी. श्रद्धालु ने उस महिला भिखारी तो २ रूपये का सिक्का देकर अपना पीछा छुडाया. मैंने वहां बैठे सभी भिखारियों को ध्यान से देखा सभी के शरीर का कोई न कोई अंग कटा हुआ था. ऐसी सम्भावना है कि किसी सक्रिय अपराधिक गैंग द्वारा गरीब बच्चो के अंग भंग कर धार्मिक स्थलों के समीप भींख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है और उन गरीब बच्चो कि जिंदगी को नरक बनाकर हमारी आस्था को पैसो में परिवर्तित कर देते है. शायद कही ना कही कुकृत्य के लिए हम भी जिम्मेदार है. मैं भिखारियों के फोटो खींचने में व्यस्त था तो विनय वहां पर एक अच्छे से स्टाइलिश चश्मे कि तालाश में था. एक चश्मा उसने ख़रीदा जिसको मैंने उसके फोटो लेते समय रिजेक्ट कर दिया तो वह दूसरा चश्मा लेने कि जिद करने लगा. पापा जी को उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा. पास में ही एक महिला कुछ पुराने सिक्के लिए बैठी थी. बहुत पुराने पुराने सिक्के थे. ईस्ट इंडिया कंपनी के समय के भी सिक्के देखे. 'एक आने' का पीतल का सिक्का जिसके सामने १० रूपये का सिक्का भी पानी मांगता नजर आये. उस महिला विक्रेता ने एक आने के सिक्के कि कीमत १५० रूपये बताई गई. पता नहीं कैसे हमारे मामा जी जो शुरू से कंजूसी करते चल रहे थे भाव तोल कर ५० रूपये में वह सिक्का उन्होंने खरीद लिया.
१ घंटे बाद ही मामा जी बडबडाने लगे "जितना टाइम बढेगा उतना ही जाम मिलेगा जल्दी निकल चलो". उनकी बात को मानते हुए सभी अब घर चलने के लिए सहमत हो गए. मुजफरनगर से आगे रूरकी तक हाईवे का निर्माण कार्य चल रहा है. बीच बीच खड्डा नुमा सड़को के बाद नयी बनी सड़क आ जाती है. पुरकाजी बाइपास कि एक लेन तैयार हो गयी है बाकी पर कार्य चल रहा है जल्द ही हम टोल रोड तक पहुँच गए तब जाके जान में जान आई उसके बाद तो फिर वही ४० मिनट का सफ़र बचा था. बतियाते बतियाते २ बजे तक घर तक पहुँच गए. इस तरह ऋषिकेश यात्रा का सफ़र समाप्त हुआ...........
नाश्ता कर के सुबह ही हम मामा जी का आशीर्वाद लेकर चल दिए. तय कार्यक्रम के अनुसार हमें मेरठ आना था लेकिन साफ़ मौसम और खुला आसमान देख कर मेरा मन ऋषिकेश पर्यटन के लिए ललचाने लगा. हालाकिं पापा जी और मामा जी ने अपनी मजबूरियां बता कर "access denied" का प्रोटोकॉल जारी कर दिया. मजबूरी में मैंने स्टारिंग को मेरठ कि और घुमा दिया. पापा जी के और ऋषिकेश वाले मामा जी के हमेशा से ही वैचारिक मतभेद रहे है. जब भी साथ होते है तो किसी न किसी विषय पर बहस करते रहते है. अब कार में बैठे हुए पापा जी पिछली रात हुई बहस को लेकर पटवारी मामा जी से समर्थन पाने कि उम्मीद में ऋषिकेश वाले मामा जी कि आलोचना कर रहे थे. एक तो पिछला पूरा दिन ट्राफिक जाम में निकल गया था दूसरा घुमने का कोई मौका नहीं मिला था इस कारन मुझे उनकी बाते बर्दास्त से बाहर होने लगी. हम हरिद्वार पहुँच चुके थे. तो गुस्से में मैंने हर कि पैडी के पास कार को पार्किंग कि और घुमा दिया. मामा जी और पापा जी भौचक रह गए. जब तक वे स्तिथि समझ पाते हमारे पीछे गाडियों कि लाइन लग चुकी थी. मैंने कहा कि कम से कम हर कि पैडी पर ही थोड़ी देर घूम लेते है. मजबूरी में दोनों को हामी भरन्नी पड़ी. विनय कि ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था.
यूँ तो हरिद्वार से कई बार गुजर चूका हूँ लेकिन हर कि पैडी पर आने का मेरा पहला अनुभव था. चारो और आस्था का सैलाब था. ऊपर से एक दिन पहले हुई जोरदार बारिश के कारण गंगा भी पूरे उफान पर थी. मामा जी पहले कई बार वहां आ चुके थे. उन्होंने बताया कि यहीं से गंग नहर निकली हुई है यह वाही नहर थी जिसकी पटरी के किनारे किनारे हम मंगलौर से रूडकी तक आये थे. मैं और विनय उत्साहित होकर वही फोटो ग्राफी में मस्त हो गए. पहाड़ी क्षेत्रो में भारी बारिश के कारण गंगा का पानी गंधला हो गया था हर कि पैडी पर चारो और रेत ही रेत फैला हुआ था. कुछ लोग रेत कि सफाई करने में लगे हुए थे. दूर दूर से आस्थावान लोग वहां आते है. मेरे पास शुरू से ही आस्था का आभाव रहा है हर कि पैडी पर आना मेरे लिए केवल पर्यटन और मनोरंजन का जरिया थे. बेहतर पोज कि चाह में विनय चप्पलो के साथ ही रेतीले पानी में उतर गया. वही पास में नहा रहा एक राजस्थानी लड़का जिसकी उम्र मात्र १८ या १९ रही होगी विनय से झगड़ने लगा. झगडा ज्यादा बढ़ता देख फोटोग्राफी बंद कर मैं विनय के पास पंहुचा दोनो लगभग हम उम्र थे. रजिस्थानी लड़के को शिकायत थी कि विनय ने चप्पलो के साथ पानी में उतर कर गंगा के पानी को अपवित्र कर दिया . इत्तेफाक से वही पास में खड़ी एक गाय मल-मूत्र त्याग कर रही थी जो बहकर गंग नहर में समायोजित हो रहा था. उस द्रश्य पर रजिस्थानी लड़के कि राय जाननी चाही. अब अचंभित होने कि बारी मेरी थी उस रजिस्थानी लड़के के अनुसार गाय हमारी माता होती है और उसके मल मूत्र के पानी में घुलने से पानी दूषित नहीं पवित्र हो जाता है. खैर इसके बाद वह राजस्थानी लड़का ज्यादा देर नहीं रुका और गंग नहर में कूदकर तैरता हुआ आगे को निकल गया. आस्था और अंधविश्वास दो अलग अलग पक्ष है. पुल कि और आगे बढे तो अनायास ही सीढियों पर लाइन लगाकर बैठे भिखारियों पर नजर गयी. एक महिला भिखारी एक श्रद्धालु से झगड़ रही थी. उसकी साथी महिला भिखारी को भीख दी तो उसे क्यों नहीं दी. श्रद्धालु ने उस महिला भिखारी तो २ रूपये का सिक्का देकर अपना पीछा छुडाया. मैंने वहां बैठे सभी भिखारियों को ध्यान से देखा सभी के शरीर का कोई न कोई अंग कटा हुआ था. ऐसी सम्भावना है कि किसी सक्रिय अपराधिक गैंग द्वारा गरीब बच्चो के अंग भंग कर धार्मिक स्थलों के समीप भींख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है और उन गरीब बच्चो कि जिंदगी को नरक बनाकर हमारी आस्था को पैसो में परिवर्तित कर देते है. शायद कही ना कही कुकृत्य के लिए हम भी जिम्मेदार है. मैं भिखारियों के फोटो खींचने में व्यस्त था तो विनय वहां पर एक अच्छे से स्टाइलिश चश्मे कि तालाश में था. एक चश्मा उसने ख़रीदा जिसको मैंने उसके फोटो लेते समय रिजेक्ट कर दिया तो वह दूसरा चश्मा लेने कि जिद करने लगा. पापा जी को उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा. पास में ही एक महिला कुछ पुराने सिक्के लिए बैठी थी. बहुत पुराने पुराने सिक्के थे. ईस्ट इंडिया कंपनी के समय के भी सिक्के देखे. 'एक आने' का पीतल का सिक्का जिसके सामने १० रूपये का सिक्का भी पानी मांगता नजर आये. उस महिला विक्रेता ने एक आने के सिक्के कि कीमत १५० रूपये बताई गई. पता नहीं कैसे हमारे मामा जी जो शुरू से कंजूसी करते चल रहे थे भाव तोल कर ५० रूपये में वह सिक्का उन्होंने खरीद लिया.
१ घंटे बाद ही मामा जी बडबडाने लगे "जितना टाइम बढेगा उतना ही जाम मिलेगा जल्दी निकल चलो". उनकी बात को मानते हुए सभी अब घर चलने के लिए सहमत हो गए. मुजफरनगर से आगे रूरकी तक हाईवे का निर्माण कार्य चल रहा है. बीच बीच खड्डा नुमा सड़को के बाद नयी बनी सड़क आ जाती है. पुरकाजी बाइपास कि एक लेन तैयार हो गयी है बाकी पर कार्य चल रहा है जल्द ही हम टोल रोड तक पहुँच गए तब जाके जान में जान आई उसके बाद तो फिर वही ४० मिनट का सफ़र बचा था. बतियाते बतियाते २ बजे तक घर तक पहुँच गए. इस तरह ऋषिकेश यात्रा का सफ़र समाप्त हुआ...........