Sunday, August 17, 2014

ऋषिकेश भ्रमण भाग १

ऋषिकेश वाले मामा जी कि तबियत काफी दिनों से खराब चल रही है. ७० वर्ष कि आयु में मामा जी पूरी तरह उर्जा से भरपूर रहते है . चार लोगो के बीच में हमेशा केंद्र बिंदु वही रहते है. मुझे जैसे ही उनके स्वास्थ्य कि खबर हुई तो तुरंत ऋषिकेश जाने का कार्यक्रम तैयार कर लिया. १५ अगस्त के दिन ध्वजारोहण के बाद पापा जी, मेरठ वाले मामा जी और छोटे भाई को साथ लेकर अपनी प्यारी फैमिली कार से ऋषिकेश के लिए रवाना हो गए. खुशकिस्मती से कार का परिचालन मेरे ही हाथो में था. मेरठ कि सडको पर यूँ तो मैं ६०- ७० कि गतिसीमा पार नहीं करता लेकिन मेरठ मुजफ्फरनगर हाईवे पर अक्सर ललचा जाता हूँ इस बार भी यही हुआ कार के स्पीडोमीटर कि सुईने १२० का आंकड़ा कब पार किया पता ही नहीं चला . लगभग ४० मिनट बाद हम रामपुर तिराहा पार कर चुके थे. पापा जी और मेरठ वाले मामा जी के सांस में सांस आ गयी. वैसे मैंने ध्यान दिया कि छोटा भाई विनय स्पीड को एन्जॉय कर रहा था. अब टोल रोड समाप्त होते ही विनय के माथे पर शिकन पड़ना लाजमी था. आगे के सफ़र में उछलते कूदते किसी तरह मंगलौर तक पहुंचे. मंगलौर पहुँचते ही वाहनों कि लम्बी लम्बी कतारों से सामना हुआ, बहुत लम्बा जाम था. जहाँ ६० किमी कि दुरी ४० मिनट में तय की थी वही १.५ किमी कि दूरी तय करने में पूरे ३ घंटे लगे. पापा जी को हमेशा खुद को व्यस्त रखने कि आदत है तो वह कार में शांति से नहीं बैठ पाए जाम के श्रोत को ढूंढने कि लिए पैदल ही रूडकी कि और चल पड़े. धीरे धीरे चींटियों कि तरह रेंगते हुए हम गंग नहर कि पटरी तक पहुचे पापा जी वही खड़े होकर हमारा इंतज़ार कर रहे थे. सीधी सड़क पर लम्बा जाम था पापा जी ने गंग नहर कि पटरी की और मुड़ने का इशारा किया तो स्टारिंग उसी और घुमा दिया. जाम मुक्त सड़क पर आकर सबसे ज्यादा आराम मेरे पैरो को मिला जाम में क्लिच ब्रेक स्पीड पर पैर एक सेकंड के लिए भी आराम नहीं कर पाते. खुली सड़क पर आते ही पैरो के साथ साथ मेरे में भी जान में जान आई कार को नहर किनारे रोककर पहले तो थोडा सा पानी पिया तब अपने सफ़र कि और रवाना हो लिए. एक बात बतानी मैं आपको भूल गया कि मेरा प्लान कुछ इस तरह था कि मामा जी कि खैर खबर लेने के बाद पापा जी और मेरठ वाले मामा जी को मामा जी के पास छोड़कर मेरी और विनय की ऋषिकेश घुमने कि योजना थी. खैर मंगलोर रूडकी को पार कर हरिद्वार कि और रवाना हो चुके थे और मैं ३ घंटे के पीड़ादायक अनुभव को भूलने कि कोशिश कर रहा था. सफ़र में आगे बढ़ते हुए पतंजलि योग पीठ के दर्शन हुए मैं बाबा रामदेव को बड़े व्यवसायी से अधिक नहीं मानता हूँ लेकिन मेरे पापा जी पर बाबा रामदेव के प्रति गहरी आस्था है. कई बार पापा जी मुझे बाबा रामदेव से प्रभावित कम उनके अनुयायी ज्यादा लगते है. हरिद्वार पहुँच पहुँचते बारिश तेज हो चुकी थी. एक बार फिर जाम रूपी दानव हरिद्वार कि सडको पर रेंग रहा था पिछले अनुभव के बाद मेरे होंसले पस्त हो चुके थे. मैं यह सोच रहा था कि किस मनहूस घडी में ऋषिकेश जाने कि कि योजना बनाई थी. मेरठ वाले मामा जी जो अपने चुटकलों से हमारी पीड़ा को कम करने कि कोशिश कर रहे थे कहने लगे कि आज उन्होंने सुबह उठकर अपनी पड़ोसन का मुह देखा था तभी आज जाम में फंस रहे है. एक बार फिर वही बोरिंग समय. घिसटते घिसटते किसी तरह हरिद्वार पार किया. जैसे जैसे ऋषिकेश कि और खिसक रहे थे वर्षा और तेज होती जा रही थी. मेरी सलाह पर मेरठ वाले मामा जी ने ऋषिकेश वाले मामा जी को फ़ोन मिलाया जो कि इत्तेफाक से उनके बड़े सुपुत्र मेरे बड़े सोनू भैया को मिल गया. सोनू भैया मुझसे लगभग १० वर्ष बड़े है . होटल मेनेजर का उनके पास लम्बा अनुभव है अब उन्होंने खुद ही हरिद्वार में एक होटल लीज पर लिया हुआ है हम उनके पास ही थे तो उन्होंने हमको होटल में ही बुला लिया. ४ बज चुके थे मैं पूरी तरह थक चूका था ऊपर से बारिश पद रही थी. छोटी मोटी दिक्कतों के बाद होटल खोजकर उनके पास पहुंचे. खैर खबर लेने के बाद उन्होंने बढ़िया सी गरमा गरम चाय पिलाई. चाय पीते ही शरीर में उर्जा का संचार हुआ. उसके बाद उनके घर पहुँचने का रास्ता पुछा तो उन्होंने घर जाने का रास्ता चार ए - ४ साइज़ के पेज पर समझाया. मुझे तो रास्ता अच्छे से समझ आ गया था लेकिन कार में बैठते ही मेरठ वाले मामा जी बडबडाने लगे कैसा मेनेजर है नक्शा बनाना भी नहीं आता. मैं इस नक़्शे को एक पेज पर ही बना कर समझा सकता था. मेरे मेरठ वाले मामा जी पेशे से पटवारी है उन्होंने पूरी उम्र नक़्शे फरद खतौनी बनाने में ही निकाल दी. उनको उनकी बात का जवाब देना चाहता था लेकिन मैंने मुस्कुराकर ही बात को टालना बेहतर समझा. हम एक बार फिर अपने सफ़र कि और रवाना हो चले थे. बारिश बढती जा रही थी. सडको पर घुटनों घुटनों पानी था. आखिरकार बहुप्रतीक्षित रेलवे लाइन को पार कर हम अपने गंतव्य पर पहुँच गए. अब वहां से मामा जी का घर ढूँढना था. बाहर तेज बारिश हो रही थी सड़के जल मग्न हो गयी थी. मेरठ वाले मामा जी सोनू भैया द्वारा बनाए उस अजीबोगरीब नक़्शे को लेकर बडबडा रहे थे. मैं नक़्शे को देखते हुए धीरे धीरे मंजिल कि और बढ़ने लगा. कॉलोनी कि सडको में घुटनों से ऊपर तक पानी भरा था. अब हमारे मामा जी कि झुंझलाहट का केंद्र मैं बन गया था मामा जी बडबडा रहे थे कि एक तो उस मेनेजर ने उल्टा सीधा नक्शा बना दिया और एक ये ड्राईवर मन मर्जी से जा रहा है. यह सही है कि मामा जी को नक़्शे बनाने का लम्बा अनुभव है लेकिन नक़्शे समझने कि थोड़ी बहुत जानकारी हमारे जग्गा सर ने मुझे भी दी है. लेकिन मैं मामा जी कि बात काटकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था उन्होंने कहा कि मैं गलत जा रहा हूँ तो मैंने u टर्न ले लिया और वापस मुख्य सड़क पर आ गए तब पापा जी ने पुनह ऋषिकेश वाले मामा जी को फोन किया. मामा जी अस्वस्थ होने के कारण खुद तो नहीं आ पाए उन्होंने अपने पोते यानि सोनू भैया के बेटे भाविक को हमें लेने भेज दिया. बारिश में तर बतर होता भाविक साइकिल पर ही हमको लेने आ गया अब हमारी कार भाविक कि साइकिल का पीछा करने लगी कॉलोनी कि सडको पर इतना पानी भरा हुआ था कि लग रहा था कि गाड़ी बंद हो जायेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं हालांकि पानी इतना था कि भाविक को भी साइकिल से उतर कर पैदल ही साइकिल खिंच कर ले जानी पड़ी एक बात बताना भूल गया कि भाविक उसी रस्ते पर हमको ले जा रहा था मैं सोनू भैया के नक़्शे कि मदद से बढ़ रहा था लेकिन हमारे पटवारी मामा जी के कहने पर u टर्न ले लिया था. हमेशा बडबडाते रहने वाले मामा जी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था वह निशब्द हो गए थे मैं और विनय पटवारी मामा जी को देखकर मुस्कुरा रहे थे. खैर जैसे तैसे इस रोमांचक सफ़र का अंत हुआ. ऋषिकेश वाले मामा जी बिस्तर पर लेते हुए थे पहले से काफी कमजोर हो गए थे. मुजको देखते ही उठ खड़े हुए और मुझको गले लगा लिया बचपन से ही मुझको अधिक स्नेह करते थे.

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